गुरुवार, 25 सितंबर 2008

औरत की भूख

वह आदमी है या जीवित पहेली, कहना मुश्किल है. औंरोंं की तो बात छोडिए पूरे पांच साल सिर खपाने के बाद पत्नी भी उसके स्वभाव को नहीं समझ पाई.बेचारी पत्नी भी क्या करे, स्वभाव ही कितना विचित्रहै उसका. पानी मंगाया पर पत्नी के पानी का गिलास लाते- लाते प्यास खत्म. कभी बिन तडके की दाल अच्छी नहीं लगती तो कभीतडके से सख्त नफरत . कभी दो ही चपातियां खाकर उठ जाता तोकभी थाली से उठने का नाम ही नहीं. पत्नी हल्के से मुस्करा भर देती-'हे भगवान सभी आदमी ऐसे ही होते हैं क्या?'वह रात खाने बैठा तो खाता ही रहा. सब्जी; दाल; सलाद सब पत्नीके आने से पहले ही साफ. वह खाने बैठी तो थाली में दो चपातियां ही बची थीं। '
इतने से काम चल जाएगा?
''हां'
'क्यों भूख नहीं लगी है क्या?
''लगी है ना'
'फिर?'
'आज कम है, वो कल मैंने दो चपातियां अधिक खा लीं थीं।''
लेकिन तुम्हारी भूख...?'
'औरत की भूख का क्या!
अधिक चपातियां बचे जाए तो भूख अधिक और कम बचें तो कम!'

-डाॅ रामनिवास
हिसार-हरियाणा

कोई टिप्पणी नहीं: