गुरुवार, 25 सितंबर 2008

काश! हमें तुम मिले न होते

हिय प्रांगण वीरान न होता
पीडा का मुझको भान न होता


कल्पनाओं को पंख न लगते
अभिव्यक्ति उनमान न होता


नैनोंं से काजल न बहता
स्वप्न कोई पलकों पे रहता


न टूटी मन की तारें होतीं
न यों नित तकरारें होतीं


मुस्काने को मुझ पागल के
होंंठ अगर ये हिले न होते


फूल अधूरी आशाओं के
मरूभूमि पर खिले न होते


काश! हमें तुम मिले न होते


-दीपिका 'ओझल'

कोई टिप्पणी नहीं: