गुरुवार, 25 सितंबर 2008

काश! हमें तुम मिले न होते

हिय प्रांगण वीरान न होता
पीडा का मुझको भान न होता


कल्पनाओं को पंख न लगते
अभिव्यक्ति उनमान न होता


नैनोंं से काजल न बहता
स्वप्न कोई पलकों पे रहता


न टूटी मन की तारें होतीं
न यों नित तकरारें होतीं


मुस्काने को मुझ पागल के
होंंठ अगर ये हिले न होते


फूल अधूरी आशाओं के
मरूभूमि पर खिले न होते


काश! हमें तुम मिले न होते


-दीपिका 'ओझल'

औरत की भूख

वह आदमी है या जीवित पहेली, कहना मुश्किल है. औंरोंं की तो बात छोडिए पूरे पांच साल सिर खपाने के बाद पत्नी भी उसके स्वभाव को नहीं समझ पाई.बेचारी पत्नी भी क्या करे, स्वभाव ही कितना विचित्रहै उसका. पानी मंगाया पर पत्नी के पानी का गिलास लाते- लाते प्यास खत्म. कभी बिन तडके की दाल अच्छी नहीं लगती तो कभीतडके से सख्त नफरत . कभी दो ही चपातियां खाकर उठ जाता तोकभी थाली से उठने का नाम ही नहीं. पत्नी हल्के से मुस्करा भर देती-'हे भगवान सभी आदमी ऐसे ही होते हैं क्या?'वह रात खाने बैठा तो खाता ही रहा. सब्जी; दाल; सलाद सब पत्नीके आने से पहले ही साफ. वह खाने बैठी तो थाली में दो चपातियां ही बची थीं। '
इतने से काम चल जाएगा?
''हां'
'क्यों भूख नहीं लगी है क्या?
''लगी है ना'
'फिर?'
'आज कम है, वो कल मैंने दो चपातियां अधिक खा लीं थीं।''
लेकिन तुम्हारी भूख...?'
'औरत की भूख का क्या!
अधिक चपातियां बचे जाए तो भूख अधिक और कम बचें तो कम!'

-डाॅ रामनिवास
हिसार-हरियाणा

बुधवार, 24 सितंबर 2008

परिंदा

होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए
इस परकटे परिंदे की कोशिश तो देखिए

गूंगे निकल पडे हैं ज़ुबां की तलाश में
सरकार के खिलाफ ये साज़िश तो देखिए


बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन
सूखा मचा रही ये बारिश तो देखिए


उनकी अपील है उन्हें हम मदद करें
चाकू की पसलियों से गुज़रिश तो देखिए



जिसने नज़र उठाई वही शख्स गुम हुआ
इस ज़िस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए



-दुषयंत कुमार

रविवार, 21 सितंबर 2008

"सरल-संघर्ष यात्रा" का विमोचन

सरल-चेतना पत्रिका के विशेषांक "सरल-संघर्ष यात्रा" का विमोचन मुखयमंतरी श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया. इस अवसर पर 'सरल-चेतना' के संपादक हेमंत रिछारिया द्वारा श्री चौहान को पत्रिका भेंट की गई.समारोह में डाॅ. जगदीश व्योम, श्री संतोष व्यास,श्री नित्य गोपाल कटारे एवं डाॅ. धरमेंदर सरल मौजूद थे!