रविवार, 18 मई 2008

गीत लिखूं

तेरे चेह्रे को लेकर हाथोंं में
मन में आता कोई गीत लिखूं
तुम्हारा चेहरा हाथों के घूंघट में
कैसा होता है मुझे पृतीत लिखूं

बंद पलकें तेरी देतीं हैं आमंतृण
उन पर अधरों से कोई रीत लिखूं
सच करने आज सपनों को
तेरे होठों पे नई सी पीृत लिखूं

हार बैठे जो दिल अपना हम
क्यों ना इसे तुम्हारी जीत लिखूं
तू जो मुस्कुरा के तनिक हां कह दे
खुद को दुनिया में तेरा मीत लिखूं

इंदु सिन्हा
रतलाम

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