शनिवार, 17 मई 2008

न हारने की ज़िद

एक पेड़ की डाल पर
तिनका तिनका चुनकर बनाया था
चिडि़या ने घोंसला,
एक एक पल को संजोकर
मैने भी बनाया था एक घर,
कल रात आया एक ज़ोर का तूफ़ान
मै सहमी; ख्यालों में घोंसला घूमा,
सुबह उदास चिडि़या
बेचैनी से उड़ती थी
पेड़ की डाल पर सिर धुनती थी
मैने सोचा अब नहीं बनाएगी घोंसला
तूफ़ान के बाद मैने भी तो
दुबारा घर ना बनाने का किया था फ़ैसला
लेकिन यह क्या
चिडिया तो फ़िर दुगनी तन्मयता से
चुनने लगी है तिनके
इसे विस्मरती का वरदान कहूं या
उसकी न हारने की ज़िद...!

-अनुराधा अंकिल
होशंगाबाद

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