गुरुवार, 15 मई 2008

जीवित शहीद - श्रीकृष्ण 'सरल'


शहीदों का चारण कहे जाने वाले श्रीकृष्ण "सरल" जन्म 01 जनवरी 1919 ई० को मध्य प्रदेश के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ। इनके पिता का नाम श्री भगवती प्रसाद तथा माता का नाम यमुना देवी था। सरल जी शासकीय शिक्षा महा विद्यालय, उज्जैन में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे। सरल जी ने अपना सम्पूर्ण लेखन भारतीय क्रांतिकारियों पर ही किया है। क्रांतिकारियों पर उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें पन्द्रह महाकाव्य हैं। साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश द्वारा श्रीकृष्ण सरल के नाम पर कविता के लिए "श्रीकृष्ण सरल पुरस्कार" प्रति वर्ष प्रदान किया जाता है। सरल जी जीवन पर्यन्त कठोर साहित्य-साधना करते रहे। प्रो॰ श्रीकृष्ण "सरल" जी बाल्यावस्था से ही क्रान्तिकारियों से परिचित होने के कारण शासन से दण्डित हुए। महर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन से प्रेरित, शहीद भगत सिंह की माता श्रीमती विद्यावती जी के सानिध्य एवं विलक्षण क्रान्तिकारियों के समीपी सरलजी ने बलिपंथी पीढ़ियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को अपने साहित्य का विषय बनाया। सुप्रसिद्ध साहित्यकार पं॰ बनारसीदास चतुर्वेदी ने कहा- ‘भारतीय शहीदों का समुचित श्राद्ध श्री सरल ने किया है।’ महान क्रान्तिकारी पं॰ परमानन्द का कथन है— ‘सरल जीवित शहीद हैं।’ जीवन के उत्तरार्ध में सरल जी आध्यात्मिक चिन्तन से प्रभावित होकर तीन ग्रन्थ लिखे— तुलसी मानस, सरल रामायण एवं सीतायन। सरल जी के मुख्य महाकाव्य है-"क्रांतिगंगा","चंद्रशेखर आज़ाद" एवं "शहीद भगत सिंह"। सरल जी ने व्यक्तिगत प्रयत्नों से 10 महाकाव्यों सहित 124 ग्रन्थ लिखे उनका प्रकाशन कराया और स्वयं अपनी पुस्तकों की 5 लाख प्रतियाँ बेच लीं। क्रान्ति कथाओं का शोधपूर्ण लेखन करने के सन्दर्भ में स्वयं के खर्च पर 10 देशों की यात्रा की। पुस्तकों के लिखने और उन्हें प्रकाशित कराने में सरल जी की अचल सम्पत्ति से लेकर पत्नी के आभूषण तक बिक गए। पाँच बार सरल जी को हृदयाघात हुआ पर उनकी कलम जीवन की अन्तिम साँस तक नहीं रुकी। सरल जी का निधन 02 सितम्बर 2000 ई० को हुआ। 

 "प्रेरणा शहीदों से अगर हम नहीं लेंगे, 
  आज़ादी ढ़लती हुई साँझ हो जाएगी
  यदि वीरों की पूजा नहीं करेंगे तो,  
  सच मानों वीरता बाँझ हो जाएगी।"

 -  श्रीकृष्ण "सरल" 





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