मंगलवार, 20 जून 2017

जीएसटी


हमारे देश में कोई कार्य सादगी से हो ही नहीं सकता। ख़ामोशी से तो केवल इस देश में भ्रष्टाचार हो सकता है। आप सही समझ रहे हैं मैं जीएसटी की ही बात कर रहा हूं। सरकार के द्वारा इसे इतना महिमामण्डित किया जा रहा है जैसे यह कोई अद्भुत कर सुधार हो। पहले तो आपने अपनी कर प्रणाली ही इतनी अव्यावहारिक बनाई फ़िर उसे थोड़ा-बहुत ठीक-ठाक करने के नाम पर इतना हो-हल्ला अनुचित है। जीएसटी के पीछे जो सबसे सशक्त दलील दी जा रही है वह यह कि इससे मंहगाई कम होगी। टैक्स स्लैब देखकर मुझे तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता, इसके विपरीत 15 प्रतिशत सर्विस टैक्स का दायर बढ़कर 18 प्रतिशत होने से जनसामान्य पर बोझ अवश्य बढ़ेगा। मेरे देखे विकास आंकड़ों में नहीं ज़मीनी स्तर पर महसूस होना चाहिए ठीक इसी प्रकार यदि वाकई जीएसटी कोई अद्भुत कर सुधार है तो यह भी इस देश की जनता को महसूस होना चाहिए केवल वित्त मन्त्री के कह देने मात्र से यह कोई ऐतिहासिक कर सुधार नहीं हो जाएगा। अत: आने वाले समय की प्रतीक्षा करें जिसकी कसौटी पर जीएसटी को परखना जाना अभी शेष है।

-संपादक

शनिवार, 10 जून 2017

ज़हर परोसने वाले काहे के "अन्नदाता"

हाल ही में प्रदेश एक उग्र किसान आन्दोलन से दहल उठा। इस आन्दोलन ने मेरे मन में कई सवाल खड़े कर दिए। आन्दोलन के पीछे जो मुख्य वजह बताई गई वह यह थी कि किसानों को उनकी पैदावार का उचित मूल्य नहीं किया जा रहा है। फ़सलों के दाम गिरे हुए हैं ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस वर्ष पैदावार बहुत अधिक मात्रा में हुई। महद्आश्चर्य है कि पैदावार अधिक होने के उपरान्त आम जनता को सस्ते दामों पर वस्तुएँ उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। जहाँ तक मेरी अल्प बुद्धि की समझ है कि किसी भी वस्तु के दाम अर्थशास्त्र के माँग-पूर्ती के सिद्धान्त पर आधारित होते हैं। इसके लिए भला सरकार कैसे ज़िम्मेवार हो सकती है? यदि पैदावार ना हो तो सरकार की ज़िम्मेवारी और यदि अधिक पैदावार हो तो भी सरकार की ज़िम्मेवारी ये गणित मेरी समझ से परे है। जहाँ तक मैं समझता हूँ सरकार की ज़िम्मेवारी फ़सलों के क्रय-विक्रय और भण्डारण की उचित व्यवस्था करने तक की है जिसके लिए मण्डियाँ व वेयर हाऊस इत्यादि की व्यवस्था होती है। अब यदि मण्डियों में फ़सल के दाम गिरे हुए हैं तो यह माँग-पूर्ती के सिद्धान्त के कारण हैं। अब थोड़ी बात करें किसान की, मेरे देखे आज वास्तविक किसान तो बहुत गिने-चुने शेष रह गए हैं। ये जो अपने आप को किसान कहते हैं ये तो किसान के भेष में शुद्ध व्यापारी हैं। मेरे देखे इनकी यह निम्नतम समर्थन मूल्य बढ़ाने और फ़सलों को क्रय करने गारण्टी वाली माँग सर्वथा अनुचित है। मैं जानता हूँ मेरे इस दृष्टिकोण की बहुत आलोचना होगी। कई बुद्धिजीवी स्वयं को किसान हितैषी बताने की होड़ में मुझे किसान विरोधी भी ठहराएँगे। बहरहाल, मैं ऐसे सभी किसान हितैषियों से यह पूछना चाहूँगा कि यदि इस प्रकार माँग कोई व्यापारी करे तब भी क्या वे उस व्यापारी का समर्थन करेंगे? कोई माल तो उनकी फ़ैक्ट्रियों में भी तैयार होता है। अब मैं इन तथाकथित अन्नदाताओं से यह पूछना चाहता हूँ जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए अन्न को सड़कों पर फ़ेंक कर विरोध जताया वास्तविक अन्नदाता अन्न का ऐसा अपमान नहीं करता; कि आपमें से ऐसे कितने किसान हैं जिन्होंने जैविक खेती करके इतनी अधिक पैदावार की है? शायद एक भी नहीं। ये सारे व्यापारी जो आज किसान का भेष धारण किए हुए हैं निजी आर्थिक लाभ के चलते रासायनिक खेती व विषयुक्त कीटनाशकों के दम पर अपनी पैदावार में वृद्धि किए हुए हैं और इसका ठीकरा वे सरकार के सिर पर फ़ोड़ना चाहते हैं, ये सर्वथा अनुचित है। ये व्यापारी अपने निजी स्वार्थ के कारण जनता के स्वास्थ्य व ज़िंदगी के साथ कितना बड़ा अत्याचार कर रहे हैं ये शायद इस देश की भोली-भाली जनता समझ भी नहीं पा रही क्योंकि उसने तो किसानों को अपना अन्नदाता मानकर उसे सदैव आदर व सम्मान ही प्रदान किया है। ये सारे व्यापारी ऐसे-ऐसे कीटनाशक व रासायनिक खाद का प्रयोग अपने खेतों में पैदावार बढ़ाने के लिए करते हैं जिनसे कैंसर जैसी गम्भीर बीमारियों के होने का खतरा रहता है। चाहे वह सब्ज़ियाँ हो, फ़ल हों या अन्य कोई खाद्यान्न, अन्न के नाम पर भोली-भाली जनता को शुद्ध ज़हर परोसने वाले ये काहे के अन्नदाता और काहे के किसान! ये तो व्यापारी हैं और व्यापार में हानि-लाभ तो स्वयं के व्यापारिक चातुर्य पर निर्भर होता है सरकार या कोई अन्य इसके लिए उत्तरदायी नहीं। विपन्न बुद्धियों का लोकतन्त्र हानिकारक होता है। इसके गम्भीर परिणाम पीढ़ियों भुगतने पढ़ते हैं। आज सरकार से अपनी अनुचित माँगे मनवाकर ये अपना अहँकार तुष्ट भले ही कर लें लेकिन ये नहीं जानते कि अन्ततोगत्वा ये पैसा जनता से ही वसूल किया जाता है। हमारे देश में अल्पसँख्यक, दलित, किसान जैसे कुछ नामों को हमने बेहद संवेदनशील बना दिया है जिसके चलते हमें कई बार बड़े हानिकारक परिणाम भुगतने पड़ते हैं। ऐसे नामों की आड़ में यदा-कदा ही चाहे राजनैतिक दल हों चाहे असामाजिक तत्व व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते नज़र आते हैं। आज आवश्यकता है इन नामों के नकाब के पीछे छिपे असली चेहरों को पहचानने की। वर्तमान समय में वास्तविक हितग्राही की पहचान सर्वाधिक दुष्कर कार्य है। यदि इन हितग्राहियों के नाम पर बहरूपिए अपनी अनुचित नीतियाँ लागू करवाने में समर्थ होते जाएँगे तो यह देश व समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होगा और इसके गम्भीर परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेंगे।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 4 जून 2017

ये कैसा विरोध...!


आज समाचार पत्र में प्रकाशित एक तस्वीर देखकर मन आहत व क्षुब्ध हो गया। कुछ प्रदर्शनकारी किसान दूध व सब्ज़ियों को सड़कों पर फ़ेंक कर नष्ट कर रहे थे। भला ये कैसे अन्नदाता...! ये किस प्रकार विरोध....? लोकतन्त्र में विरोध करने का अधिकार सभी को है लेकिन उसके तरीके उचित होने चाहिए। अभी कुछ दिनों पूर्व केरल में पशु बिक्री पर प्रतिबन्ध का विरोध भी कुछ ऐसे ही निन्दित व घृणित तरीके से किया गया था। आज सड़कों पर दूध व सब्ज़ियाँ नष्ट करते इन तथाकथित अन्नदाताओं को इतना भी होशोहवास नहीं रहा कि इससे कितने लोगों की क्षुधा तृप्त हो सकती थी। सड़कों पर बहते इस दूध से कितने मासूमों की जठराग्नि शान्त हो सकती थी। इस प्रकार भोज्य पदार्थों को अपने स्वार्थ के चलते सड़कों पर निरादर से नष्ट करके इन्होंने माँ अन्नपूर्णा का तो अपमान किया ही है साथ ही साथ अपने अन्नदाता होने के दर्जे को भी लज्जित किया है। मैं इस कृत्य की घोर निन्दा करता हूँ।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 3 जून 2017

क्या भूत-प्रेत होते हैं?

भूत-प्रेत का नाम सुनते ही मन में भय व दहशत व्याप्त हो जाती है। तार्किक लोग भूत-प्रेत के अस्तित्व को सिरे से नकारते हैं वहीं कुछ अन्धविश्वासी सामान्य मनोरोगों को भी भूत-प्रेत से जोड़कर देखते हैं। लेकिन क्या सचमुच भूत-प्रेत होते हैं इस प्रश्न का उत्तर शायद ही किसी को संतुष्ट कर पाता हो। आज हम इसी रहस्य को समझने का प्रयास करेंगे। प्रारम्भिक दौर में विज्ञान भूत-प्रेत के अस्तित्व को खारिज करता आया है लेकिन वर्तमान दौर में वह इन्हें एक दिव्य उर्जा के रूप में स्वीकार करने लगा है। हमारे मतानुसार इस रहस्य को विज्ञान कभी भी नहीं जान पाएगा ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान मशीनी उपकरणों के माध्यम से चेतना को जानने का प्रयास करता है जबकि यह चेतनाएँ जिस एकमात्र उपकरण के माध्यम से जानी जा सकती हैं वह उपकरण है मनुष्य शरीर। हमारा भौतिक शरीर जिसे स्थूल शरीर भी कहा जाता है, कई शरीरों का संग्रहीत रूप है। हमारे स्थूल शरीर के भीतर अन्य शरीरों की पर्तें होती हैं। इन शरीरों को सूक्ष्म शरीर, आकाश शरीर, मनस शरीर, आत्मिक शरीर, ब्रह्म शरीर व निर्वाण शरीर कहा जाता है। जिसे सामान्य भाषा में भूत-प्रेत कहा या समझा जाता है वह वास्तविक रूप में मनुष्य का सूक्ष्म शरीर होता है। इस सूक्ष्म शरीर में मनुष्य की सारी भावनाएँ, मन, स्मृतियाँ व अन्य शरीर संग्रहीत रहते हैं। सामान्य मृत्यु में व्यक्ति का केवल भौतिक या स्थूल शरीर ही नष्ट होता है। सूक्ष्म शरीर आगे की यात्रा के लिए बचा रह जाता है। इसी सूक्ष्म शरीर के कारण मनुष्य को अगला जन्म प्राप्त होता है। यह सूक्ष्म शरीर आवागमन का आधार है। सूक्ष्म शरीर जब तक भौतिक शरीर धारण नहीं कर लेता है तब तक उसकी संसार में स्थिति व उपस्थिति को ही भूत-प्रेत के नाम से जाना जाता है। सरल शब्दों में भूत-प्रेत वास्तव में मनुष्य का सूक्ष्म शरीर ही है। सामान्यत: साधारण जीवात्माएँ मृत्यु के उपरान्त बहुत शीघ्र ही नया जन्म ले लेती हैं लेकिन कुछ असाधारण जीवात्माएँ; जिनमें बहुत श्रेष्ठ जिन्हें हम देवताओं की श्रेणी में रखते हैं और बहुत निकृष्ट जिन्हें हम भूत-प्रेत की श्रेणी में रखते हैं,अपने स्वभावगत कारणों व वासनाओं के कारण नया जन्म लेने में विलम्ब करती हैं। इस काल में ये जीवात्माएँ सूक्ष्म शरीर के रूप में संसार में विद्यमान रहती हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में ये जीवात्माएँ साँसारिक मनुष्यों के सम्पर्क में आकर अपनी उपस्थिति का अहसास भी कराती हैं लेकिन ये बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में होता है। जिसे प्रचलित भाषा में बाबा,देव,माता,भूत-प्रेत इत्यादि नामों से जाना जाता है। अक्सर समाज में भूत-प्रेत का भय दिखाकर जनमानस का शोषण किया जाता है। यह सर्वथा अनुचित है। सूक्ष्म शरीर का साँसारिक क्रियाकलापों में हस्तक्षेप बहुत ही असाधारण परिस्थितियों में होता है। अत: ना तो इन सूक्ष्म शरीरों से अत्यधिक भयभीत होने की आवश्यकता है और ना इनके अस्तित्व को सिरे से नकारना ही उचित है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 22 मई 2017

महाभारत का महागणित


महाभारत का नाम सुनते ही जो सबसे पहली बात ध्यान में आती है वह यह कि इस युद्ध में लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहूति दी थी। कुछ विद्वानों के अनुसार तो महाभारत के युद्ध में करोड़ों सैनिक मारे गए थे। हालांकि उस काल में इस देश की जनसंख्या के अनुपात में यह बात अतिश्योक्ति ही लगती है लेकिन एक बात निश्चित है कि महाभारत के युद्ध में मारे गए सैनिकों की कोई प्रामाणिक संख्या आज तक बताई नहीं जा सकी लेकिन सामरिक ग्रन्थों में अक्षौहिणी सेना का जो वर्णन है उस आधार पर आज मैं आपको महाभारत युद्ध में मारे गए सैनिकों की प्रामाणिक संख्या बताने जा रहा हूँ। यह संख्या मैंने गणना के आधार प्राप्त की है। आप स्वयं भी इसकी गणना कर सकते हैं।

जैसा कि आपको विदित है महाभारत के युद्ध में पाण्डवों के पास 7 अक्षौहिणी सेना व कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी। आईए जानते हैं कि 1 अक्षौहिणी सेना में क्या-क्या होता है।
1 अक्षौहिणी सेना-
----------------------
महाभारत काल में सेना की सबसे छोटी ईकाई को "पती" कहते थे।
1 पती के अन्तर्गत होता था-
1 रथ, 1 हाथी, 3 घोड़े एवं 5 पैदल सैनिक।
3 पति को 1 सेनामुख कहा जाता था अर्थात्...
3 पति = 1 सेनामुख
3 सेनामुख = 1 गुल्म
3 गुल्म = 1 गण
3 गण = 1 वाहिनी
1 वाहिनी = 1 पृतना
3 पृतना = 1 चमू
3 चमू = 1 अनीकिनी
10 अनीकिनी = 1 अक्षौहिणी सेना
अत: उपर्युक्त गणना के आधार पर 1 अक्षौहिणी सेना में होते हैं-
रथ संख्या-  21,870
हाथी-  21,870
घोड़े-  65,610
पैदल सैनिक- 1,09,350
अत: इस आधार पर महाभारत के युद्ध में प्रयुक्त हुई कुल 18 अक्षौहिणी सेना में थे-
कुल रथ- 3,93,660
कुल हाथी- 3,93,660
कुल घोड़े- 11,80,980
पैदल सैनिक- 19,68,300
अब यदि पैदल सैनिक+रथी+घुड़सवार+गजसवार इन सभी को सम्मिलित किया जाए तो 18 अक्षौहिणी सेना के कुल सैनिकों व योद्धाओं की संख्या बनती है-

47 लाख 43 हज़ार 920 योद्धा....ये सभी महाभारत के युद्ध में मारे गए थे।



निवेदन- उपर्युक्त संख्या अक्षौहिणी सेना की व्यवस्था के आधार पर प्राप्त हुई है जो पूर्णत: सत्य तो नहीं किन्तु किसी भी अतिश्योक्तिपूर्ण संख्या को परखने की कसौटी अवश्य है।



-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

रविवार, 21 मई 2017

भारत का नामकरण


जैसा कि आप सभी को विदित है हमारे देश का नाम "भारत" चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर पड़ा है किन्तु क्या आप यह जानते हैं कि ये भरत कौन थे? निश्चय ही आपका उत्तर होगा "दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र", लेकिन यह असत्य है। ये बात सही है कि दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र का नाम भी भरत था किन्तु इन भरत के नाम पर इस देश का नाम भरत नहीं रखा गया। इस देश का नाम भारत जिन चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर रखा गया वे ऋषभदेव-जयन्ती के पुत्र थे। ये वही ऋषभदेव हैं जिन्होंने जैन धर्म की नींव रखी। ऋषभदेव महाराज नाभि व मेरूदेवी के पुत्र थे। महाराज नाभि और मेरूदेवी की कोई सन्तान नहीं थी। महाराज नाभि ने पुत्र की कामना से एक यज्ञ किया जिसके फ़लस्वरूप उन्हें ऋषभदेव पुत्र रूप में प्राप्त हुए। ऋषभदेव का विवाह देवराज इन्द्र की कन्या जयन्ती से हुआ। ऋषभदेव व जयन्ती के सौ पुत्र हुए जिनमें सबसे बड़े पुत्र का नाम "भरत" था। भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए। इन्हीं चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" पड़ा। इससे पूर्व इस देश का नाम "अजनाभवर्ष" या "अजनाभखण्ड" था क्योंकि महाराज नाभि का एक नाम "अजनाभ" भी था। अजनाभ वर्ष जम्बूद्वीप में स्थित था, जिसके स्वामी महाराज आग्नीध्र थे। आग्नीध्र स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र थे। प्रियवत समस्त भू-लोक के स्वामी थे। उनका विवाह विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से हुआ था। महाराज प्रियव्रत के दस पुत्र व एक कन्या थी। महाराज प्रियव्रत ने अपने सात पुत्रों को सप्त द्वीपों का स्वामी बनाया था, शेष तीन पुत्र बाल-ब्रह्मचारी हो गए थे। इनमें आग्नीध्र को जम्बूद्वीप का स्वामी बनाया गया था। श्रीमदभागवत (५/७/३) में कहा है कि-
"अजनाभं नामैतदवर्षभारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति।"
इस बात के पर्याप्त प्रमाण हमें शिलालेख एवं अन्य धर्मंग्रन्थों में भी मिलते हैं। अग्निपुराण में स्पष्ट लिखा है-
"ऋषभो मरूदेव्यां च ऋषभाद् भरतोऽभवत्।
ऋषभोऽदात् श्री पुत्रे शाल्यग्रामे हरिंगत:,
भरताद् भारतं वर्ष भरतात् सुमतिस्त्वभूत॥"
वहीं स्कन्द पुराण के अनुसार-
"नाभे: पुत्रश्च ऋषभ ऋषभाद भरतोऽभवत्।
तस्य नाम्ना त्विदं वर्षं भारतं चेति कीर्त्यते॥"
(माहेश्वर खण्ड)
इसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण व भक्तमाल आदि ग्रन्थों में भी मिलता है। अत: दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारत" होना केवल एक जनश्रुति है सत्य नहीं।

-ज्योतिर्विद पं हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 20 मई 2017

सरायख़ाना

यहाँ किसका कब हुआ ठिकाना है
ये दुनिया बस इक सरायख़ाना है।

कौन आएगा और जाएगा यहाँ से
रूह को तो आना ना कहीं जाना है।

वो मिला ही है तूने खोया कहाँ है
पाने का तो अच्छा इक बहाना है

मेरी सारी कोशिश यही है दानां
बूँद को समन्दर से अब मिलाना है

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया