सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...


जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पँख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधेरे घिरे अब,
स्वयँ धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

तुमको दीप जलाना होगा

चहुँओर अँधियारा है
दिनकर भी थक हारा है
लेकिन मेरी देहरी पर
उजियारे को लाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

तन्हाई का डेरा है
दु:ख ने किया बसेरा है
इस भीषण दावानल में
अपना हाथ बढ़ाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...

बहुत दूर किनारा है
प्रतिकूल नदी की धारा है
भँवर में फँसी नैया की
अब पतवार चलाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा....

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया




हमारा सौरमण्डल


चन्द्रमा -
1. चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है। चन्द्रमा हमारे सौरमण्डल का पाँचवा सबसे बड़ा उपग्रह है।
2. चन्द्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं है बल्कि यह सूर्य से पड़ने वाली रोशनी के कारण चमकता है।
3. चन्द्रमा पृथ्वी से 4 गुना छोटा है।
4. चन्द्रमा का गुरूत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में काफ़ी कम है।
5. खगोलशास्त्रियों के अनुसार चन्द्रमा पृथ्वी का ही एक हिस्सा है जो करोड़ों वर्षों पर पूर्व एक
    उल्का पिण्ड के पृथ्वी  से टकराने के कारण टूट कर अलग हो गया था।
6. पृथ्वी पर जिस वस्तु का वज़न 10 किग्रा है चन्द्रमा पर उसका वज़न मात्र 1.5 किग्रा होगा।
7. पृथ्वी से चन्द्रमा का केवल एक हिस्सा ही दिखाई देता है। दूसरा हिस्सा पृथ्वी से कभी नहीं दिखेगा।
8. पृथ्वी से चन्द्रमा का केवल 59 फ़ीसदी हिस्सा ही दिखाई देता है। चन्द्रमा का 41 फ़ीसदी हिस्सा केवल अंतरिक्ष में जाकर ही देखा जा सकता है।
9. चन्द्रमा पृथ्वी का एक चक्कर लगाने में 27 दिन 7 घण्टे का समय लगाता है एवं ठीक इतने ही समय में वह अपनी धुरी पर एक बार घूम जाता है।

मंगल ग्रह-
1. यह आकार में पृथ्वी से 10 गुना छोटा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 22 करोड़ 79 लाख किमी है।
3. मंगल ग्रह पर एक साल 687 दिन का होता है।
4. यह ठोस ग्रह है।
5. इसके दो चन्द्रमा हैं।
6. मंगल ग्रह का सबसे बड़ा पर्वत ओलम्पस माउण्ट हमारे एवरेस्ट पर्वत से 3 गुना बड़ा है।
7. यदि आपका वज़न 100 किलो है तो मंगल पर आपका वज़न सिर्फ़ 37 किलो होगा क्योंकि मंगल पर गुरुत्वाकर्षण बल बेहद कम है।

बुध ग्रह-
1. इसकी सूर्य से दूरी 5.5 करोड़ किमी है।
2. यह सूर्य की परिक्रमा 1.5 दिन में पूरी कर लेता है।
3. यह सौरमण्डल का सबसे छोटा ग्रह है।

गुरू ग्रह-
1. हमारी पृथ्वी से 1300 गुना बड़ा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 78 करोड़ किलोमीटर है।
3. यह अपनी धुरी पर घूमने वाला सबसे तेज ग्रह है। यह 9 घण्टे 55 मिनिट में अपनी धुरी का 1 चक्कर लगा लेता है।
4. यह गैसीय ग्रह है।
5. इस ग्रह का एक चन्द्रमा है।

शुक्र ग्रह-
1. यह आकार में पृथ्वी से आँशिक छोटा है।
2. सूर्य से इसकी दूरी 11 करोड़ किलोमीटर है।
3. यह सौरमण्डल के नर्क के समान है क्योंकि यहाँ  सल्फ़्यूरिक एसिड के बादल हैं जिनसे तेजाब की बारिश होती रहती है।
4. यह सबसे गर्म ग्रह है। इसका अधिकतम तापमान 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।
5. इस ग्रह का कोई चन्द्रमा नहीं है।
6. यह सौरमण्डल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ सूर्य पश्चिम से निकलकर पूर्व में अस्त होता है।
7. शुक्र ग्रह का एक साल 224 दिनों का होता है।
8. जब यह पृथ्वी के सर्वाधिक निकट होता है तब पृथ्वी से इसकी दूरी 26करोड़ किमी होती है और जब यह पृथ्वी से सर्वाधिक दूर होता है तब पृथ्वी से इसकी दूरी 160 करोड़ किमी होती है।

शनि ग्रह-
1. हमारी पृथ्वी से 700 गुना बड़ा है।
2. सूर्य से इसकी 142 करोड़ किलोमीटर है।
3. शनि ग्रह पर 1800 किमी. प्रतिघण्टे की रफ़्तार से हवाएँ चलती हैं।
4. शनि ग्रह के 62 उपग्रह हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

अन्धभक्ति नहीं होनी चाहिए


इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो और तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें विजयादशमी की पूजा वाले दिन हमारे प्रधानसेवक मोदी जी को टिश्यू पेपर को अपने जेब में रखते हुए दिखाया जा रहा है। मोदी भक्त इसे उनकी महानता का प्रतीक बताकर सोशल मीडिया पर खूब साझा कर रहे हैं। सही भी है करना भी चाहिए; महानता भी है जो स्वच्छता का इतना ख्याल रखा गया लेकिन इसी कार्यक्रम इन्हीं प्रधानसेवक ने जूते पहनकर जब राम-लक्ष्मण व हनुमान बने पात्रों की पूजा व आरती की उसे क्या कहिएगा? केवल प्रधानसेवक मोदी ने ही नहीं अपितु राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सहित सभी अतिथियों ने जूते पहनकर ही राम-लक्ष्मण व हनुमान बने पात्रों की पूजा अर्चना की थी। मेरा इस बात को इस मंच पर रखने का आशय बस इतना ही है भक्ति अपनी जगह ठीक है लेकिन अन्धभक्ति नहीं होनी चाहिए, जो इन दिनों कुछ लोग प्रधानसेवक की करने में लगे हुए हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 30 सितंबर 2017

विसर्जन का महत्त्व



आज देवी-विसर्जन के साथ ही नौ दिनों से चले आ रहे शारदीय नवरात्र समाप्त जाएँगे। हमारी सनातन परम्परा में विसर्जन का विशेष महत्त्व है। विसर्जन अर्थात् पूर्णता, फ़िर चाहे वह जीवन की हो, साधना की हो या प्रकृति की। जिस दिन कोई वस्तु पूर्ण हो जाती है उसका विसर्जन अवश्यंभावी हो जाता है। आध्यात्मिक जगत् में विसर्जन समाप्ति की निशानी नहीं अपितु पूर्णता का सँकेत है। देवी-विसर्जन के पीछे भी यही गूढ़ उद्देश्य निहित है। हम शारदीय नवरात्र के प्रारम्भ होते ही देवी की प्रतिमा बनाते हैं, उसे वस्त्र-अलँकारों से सजाते हैं। नौ दिन तक उसी प्रतिमा की पूर्ण श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना करते हैं और फ़िर एक दिन उसी प्रतिमा को जल में विसर्जित कर देते हैं। विसर्जन का यह साहस केवल हमारे सनातन धर्म में ही दिखाई देता है क्योंकि सनातन धर्म इस तथ्य से परिचित है कि आकार तो केवल प्रारम्भ है और पूर्णता सदैव निराकार होती है। यहाँ निराकार से आशय आकारविहीन होना नहीं अपितु सम्रगरूपेण आकार का होना है। निराकार अर्थात् जगत के सारे आकार उसी परामात्मा के हैं। मेरे देखे निराकार से आशय है किसी एक आकार पर अटके बिना समग्ररूपेण आकारों की प्रतीती। जब साधना की पूर्णता होती है तब साधक आकार-कर्मकाण्ड इत्यादि से परे हो जाता है। तभी तो बुद्धपुरूषों ने कहा है "छाप तिलक सब छीनी तोसे नैना मिलाय के...।" नवरात्र के यह नौ दिन इसी बात की ओर सँकेत हैं कि हमें अपनी साधना में किसी एक आकार पर रूकना या अटकना नहीं है अपितु साधना की पूर्णता करते हुए हमारे आराध्य आकार को भी विसर्जित कर निराकार की उपलब्धि करना है। जब इस प्रकार निराकार की प्राप्ति साधक कर लेता है तब उसे सृष्टि के प्रत्येक आकार में उसी एक के दर्शन होते हैं जिसे आप चाहे तो परमात्मा कहें या फ़िर कोई और नाम दें, नामों से उसके होने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। साधना की ऐसी स्थिति में उपनिषद् का यह सूत्र अनुभूत होने लगता है-"सर्व खल्विदं ब्रह्म" और यही परमात्मा का एकमात्र सत्य है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

मन रूपी रावण का दहन हो


आज विजयादशमी है। असत्य पर सत्य की; बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व। विजयादशमी के ही दिन मर्यादा पुरूषोत्तम् भगवान राम ने रावण का वध किया था। इसी दिन को स्मरण करने लिए प्रतिवर्ष हम विजयादशमी का उत्सव मनाते हैं जिसमें रावण के पुतले का दहन किया जाता है। रावण के पुतले के दहन के साथ हम यह कल्पना करते हैं कि आज सत्य की असत्य पर जीत हो गई और अच्छाई ने बुराई को समाप्त कर दिया। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाता है! सनातन धर्म की यह परम्पराएँ केवल आँख मूँद कर इनकी पुनुरुक्ति करने के लिए नहीं हैं। बल्कि यह परम्पराएँ तो हमें इनके पीछे छिपे गूढ़ उद्देश्यों को स्मरण रखने एवं उनका अनुपालन करने के लिए बनाई गई हैं। आज हम ऐसी अनेक सनातनधर्मी परम्पराओं का पालन तो करते हैं किन्तु उनके पीछे छिपी देशना एवं शिक्षा को विस्मृत कर देते हैं। हमारे द्वारा इन सनातनी परम्पराओं का अनुपालन बिल्कुल यन्त्रवत् होता है। विजयादशमी भी ऐसी एक परम्परा है। जिसमें रावण का पुतला दहन किया जाता है। रावण प्रतीक है अहँकार का; रावण प्रतीक है अनैतिकता का; रावण प्रतीक है सामर्थ्य के दुरुपयोग का एवं इन सबसे कहीं अधिक रावण प्रतीक है- ईश्वर से विमुख होने का।  रावण के दस सिर प्रतीक हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि अवगुणों के। रावण इन सारे अवगुणों के मिश्रित स्वरूप का नाम है। रावण के बारे में कहा जाता है कि वह प्रकाण्ड विद्वान था। किन्तु उसकी यह विद्वत्ता भी उसके स्वयं के अन्दर स्थित अवगुण रूपी रावण का वध नहीं कर पाई। तब वह ईश्वर अर्थात् प्रभु श्रीराम के सम्मुख आया। मानसकार ने ईश्वर के बारे में कहा है-"सन्मुख होय जीव मोहि जबहिं। जनम कोटि अघ नासहिं तबहिं॥ इसका आशय है जब जीव मेरे अर्थात् ईश्वर के सम्मुख हो जाता है तब मैं उसके जन्मों-जन्मों के पापों का नाश कर देता हूँ। हम मनुष्यों में और रावण में बहुत अधिक समानता है। यह बात स्वीकारने में असहज लगती है, किन्तु है यह पूर्ण सत्य। हमारी इस पञ्चमहाभूतों से निर्मित देह में मन रूपी रावण विराजमान है। इस मन रूपी रावण के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, वासना,भ्रष्टाचार, अनैतिकता इत्यादि दस सिर हैं। यह मन रूपी रावण भी ईश्वर से विमुख है। जब इस मन रूपी रावण का एक सिर कटता है तो तत्काल उसके स्थान पर दूसरा सिर निर्मित हो जाता है। ठीक इसी प्रकार हमारी भी एक वासना समाप्त होते ही तत्क्षण दूसरी वासना तैयार हो जाती है। हमारे मन रूपी रावण के वध हेतु हमें भी राम अर्थात् ईश्वर की शरण में जाना ही होगा। जब हम ईश्वर के सम्मुख होंगे तभी हमारे इस मनरूपी रूपी रावण का वध होगा। विजयादशमी हमें इसी सँकल्प के स्मरण कराने का दिन है। आईए हम प्रार्थना करें कि प्रभु श्रीराम हमारे मन स्थित रावण का वध कर हमें अपने श्रीचरणों में स्थान दें। जिस दिन यह होगा उसी दिन हमारे लिए विजयादशमी का पर्व सार्थक होगा।
 
-ज्योतिर्विदपं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

दुर्गा महोत्सव 2017-